Friday, April 1, 2011

जहाँ मान वहां भगवान् कहाँ हैं Gopi Geet Part 1 | Vinod Agrawalji

  Gopi Geet occupies a very special position in bhakti path. I got this recording called 'Madhur Ras Baras Raha"  from iTunes. It is a 2 hour long recording sung beautifully by Vinod Agrawalji.
It starts with Gopis doing raslila with Krishna ji. Then, Krishnaji disappears as gopis develop ego. Then gopis look for him.
गोपी गीत का रसिक साहित्य में अपना स्थान है. मधुर रस बरस रहा रेकॉर्डिंग मुझे iTunes के माध्यम से प्राप्त हुई. इसमें २ घंटे में विनोद अग्रवाल जी ने बहुत सुन्दर रूप से इस प्रसंग को गया है.
इस प्रसंग के शुरू में गोपियाँ कृष्ण जी के साथ न्र्तिया कर रही है. फिर उनके मनन में अभिमान आ जाता है. तो कृष्ण जी अंतर्ध्यान हो जाते है... फिर गोपियाँ उन्हें ढूँढती है.
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चंदा की चांदनी में, यमुना के तीरे, मस्ती से बांसुरी बजाये धीरे धीरे
मदन गोपाल प्यारो मदन गोपाल 
मधुबन के कुंजन में मनहर की बातें, छोटे से कन्हैय्या की ऊंची ऊंची  बातें,
मदन गोपाल प्यारो मदन गोपाल

बढ़ता रहे नित्य वियोग में जो, वह प्राप्त हुए पर ध्यान कहा है
(गोपियों के ह्रदय में श्री कृष्ण के प्रति जो अपर प्रेम है, उसको संसार  को व्यक्त करने के लिए, श्री कृष्ण जी अंतर्ध्यान होते है. जैसे किसी कमरे में बल्ब जल रहा हो, तो लाइट का मोल नहीं. बल्ब बंद करते ही...)
पिता पालक रक्षा तुम्ही करना, मन पापी हमारे समान कहा है
हुए रूप से गर्विता गोपियाँ भी, कलि जीवों का तुच्छ  विधान कहाँ हैं?
हरी अंतर्ध्यान तुरंत हुए, जहाँ मान वहां भगवान् कहाँ हैं?

(सख्य या वात्सल्य भाव में प्रभु  के अतिरिक्त और चीज़ों का देखना विकार नहीं है. लेकिन कान्त भाव में श्याम सुन्दर के अतिरिक्त कुछ भी दिखे, वोह दोष है. गोपियों का  मिलन के समय के समय ध्यान अपने सौभाग्य पर चला गया. तुरंत श्याम सुन्दर अन्तेर्ध्याँ हो गए)

ब्रिजराज कुमार खड़े थे जहाँ, वहां विव्हल हो कर लेटने दौड़ी
कुछ कूद पड़ी यमुना जल में, विरहानल ज्वाला को मेटने दौड़ी,
पदचिन्हे बने जिस मेंद्वानी पर, उस ठौर की धूल समटने दौड़ी
मनमोहनी वंशी बजायी जहाँ, वट वल्लरी वृन्द को भेटने दौड़ी
हा कृष्ण प्यारे, हा श्याम प्यारे...

बिना पागल प्रेमियों के जग में, रुचती मन में यह राह किसे है
ब्रिज्गोपियों के अतिरिक्त भला, प्रभु प्रेम पयोधि की थाह किसे है ?
जब जीवन नाथ ने साथ तजा,  तब जीवन की रही चाह किसे है
पता पूछती वृक्षों से श्याम कहाँ,  जड़ चेतन की परवाह किसे है
(सारा अहंकार... ममता सब विगलित हो गया... जड़ चेतन का भेद भी मिट गया...)
हा कृष्ण प्यारे, हा श्याम प्यारे...

वरवंश  तुम्हारे ही अंश से तो, उपजी वरवंशी भरे रस प्याला
(बांस का पेड़ देख कर पूछती है उससे, तुम इतने ऊचे हो.. देख कर बताओ कहा है कृष्ण)
जिसकी ध्वनी विश्व में गूंज रही, जिसने हमें पागल सा कर डाला
हरे कृष्ण दावाग्नि समान बढ़ी, उर में विराहग्नि की भीषण ज्वाला
तुम प्रेमी पुरातन हो जिसके, कहो बांस कहाँ है वोह मुरली वाला

फिर गोपियों को गिरिराज दिखाई देते है... उनसे पूछती है...

कपिलाये चराते जो नित्य रहे, वोह ग्वारियों के सिरताज कहा हैं
नख ऊपर धारा जिन्होंने तुम्हे, हमें ताज भाग गए वोह आज कहाँ हैं
हरे कृष्ण मुमुर्शु समान हुई, बिना साजन के सुखसाज कहाँ हैं
बड़े ऊचे विराजते हो वन में, गिरिराज कहो ब्रिजराज कहाँ हैं?
 हा कृष्ण प्यारे, हा श्याम प्यारे...

(गोपियों को खयाला आता है... की अगर हम उनको धोंधने के लिए जायेंगे, तो वोह छिपने के लिए और अँधेरे में कंटीले झड़ी में जा सकते है. इससे श्री कृष्ण को हम दुःख ही देंगी. यह सोच कर जहाँ से कृष्ण अंतर्ध्यान हुए थे वही आकर बैठ जाती है. और यहाँ से गोपीगीत शुरू होता है...)

कृष्ण तुव जन्म से ब्रिज की शोभा बढ़ी, रमा देवी ने नित्य निवास किया
उगला धनधान्य वसुंधरा ने, फला अन्न त्रिनादी  का दान दिया
हरे कृष्ण त्रिताप का नाम नहीं, वैकुण्ठ से बढ़ कर सुख लिया
करूणानिधि रूठ गए फिर क्यों, वन में तज के निज प्राणप्रिया?

तुम केवल नन्द के लाला नहीं,  सब प्राणियों के उर अंतर्यामी
(प्रेमी को अगर पूर्ण ज्ञान न हो.. यह संभव है की जिसके प्रति प्रेम हो उसके बारे में पूर्ण ज्ञान नहो... तो प्रेम नहीं टिक सकता..)
सुरव्रंद की प्रार्थना से प्रकटे, भवभार उतारने को खग गामी
हरे कृष्ण अनादी अनंत तथा, अविनाशी अनित्य निरीह निकामी
कृपया मम मस्तक पर पे अपना, धरिये कर कोमल श्रीपति स्वामी
(मस्तक पर हाथ, वक्षस्थल पर चरण रख दो... यह कामनाये गोपीगीत में है... चार stages है प्रार्थना की - पहले गायन, फिर प्रलाप, फिर रूदन या विलाप ....)

तैने कहा लगायी  इतनी देर अरे ओ सांवरिया ......

(इन  चेष्टाओं  से  गोपियाँ  अब  मुर्तिमंत्र  श्री  कृष्ण  दर्शन  लालसा  बन  गयी  है)

तन में ममता नहीं शेष बची, मन में महाभाव की भीड़ बनी थी
मिटी वासना दिव्य प्रकाश हुआ,  कटी वेगी जो कर्म की रज्जू तनी थी
उपमा कही ढूंढे नहीं मिलती, ब्रिजसुन्दरी जैसे सनेहसनी थी 
हरे कृष्ण यही कहना पड़ता, वे कृष्ण के ध्यान में कृष्ण बनी थी 

दृग कन्दरा निर्झर से बरसे, नहीं जान पड़े विधि अब क्या होना 
(इतना संताप देख कर ब्रह्मा जी की सृष्टि अचंभित हो गयी... सारे ब्रह्माण्ड के पाप मिल कर इतना संताप किसी को नहीं दे सकते जितना गोपिया महसूस कर रही थी... )
बढती जब पीड़ा असह्य बढ़ी, तब सूझता जीव को जीवन खोना... 
(गोपिया सोचती है की अगर हम जीवन की इहलीला समाप्त कर देती है, तो वोह यह बात सुनेंगे... तो उन्हें दुःख होगा... तो हम कृष्ण जी यह दुःख नहीं दे सकती... तो गोपिय जीवित रहने का निर्णय लेती है)

दृग कन्दरा निर्झर से बरसे, नहीं जान पड़े विधि अब क्या होना
बढती जब पीड़ा असह्य बढ़ी, तब सूझता जीव को जीवन खोना
करके सब संभव यत्न थकी, मिलता नहीं सुन्दर श्याम सलोना...

Wednesday, January 26, 2011

Motivational from Gopal das Neeraj

Though this is not exactly devotional, but I found quite motivational to think about in times of adversity.

छुप छुप अंश्रु बहाने वालो, मोती व्यर्थ लुटाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है

सपना क्या है, नयन सेज पर सोया हुआ आँख का पानी
बह जाना उसका यूँ की जागे कच्ची नींद जवानी
कच्ची उम्र बनाने वालो, डूबे बिना नहाने वालो
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है
- गोपाल दस नीरज

Tum meri laaj rakho | Surdas | Jagjit Singh

This bhajan is written by Surdas ji. I have a recording sung by Jagjit Singh.

तुम मोरी राखो लाज हरि

तुम जानत सब अन्तर्यामी , करनी कछु ना करी
तुम मोरी राखो लाज हरि

औगुन मोसे बिसरत नाही, पल छिन घरी घरी
तुम मोरी राखो लाज हरि

दारा सुत धन मोह लिए हो, सुध बुध सब बिसरी
तुम मोरी राखो लाज हरि

 सूर पतित को बेग उबारो, अब मेरी नाव तरी (?)
तुम मेरी राखो लाज हरि

Door nagari: sung by Shri Mridul Krishna Shastriji written by Meerabai

यह मीरा बाई का लिखा हुआ भजन है. 

दूर नगरी बड़ी दूर नगरी
कैसे आऊं मैं कन्हाई, तोरी गोकुल नगरी
दूर नगरी बड़ी दूर नगरी

रात को आऊं कान्हा डर मोहि लागे
दिन को आऊं तो देखे सारी नगरी
दूर नगरी बड़ी दूर नगरी

सखी संग आऊं कान्हा शर्म मोहे लागे
अकेली आऊं तो भूल जाऊ  डगरी
दूर नगरी बड़ी दूर नगरी

 धीरे धीरे चलूँ  तो कमर मोरी लचके
 झटपट चलूँ तो छलकाए गगरी
दूर नगरी बड़ी दूर नगरी

मीरा काहे प्रभु गिरिधर नागर
तुमरे दरस बिन मैं तो हो गयी बावरी
दूर नगरी बड़ी दूर नगरी

Wednesday, December 29, 2010

Ik kor kripa ki kar do by Baldevji

In my recent trip to Vrindavan, I picked up this CD with bhajans sung by बलदेवजी, who mostly accompanies Vinod Agrawalji:

इक कोर कृपा की कर दो स्वामिनी श्री राधे
दासी की झोली भर दो लाडली श्री राधे

मैं तो राधा राधा सदा ही रटु
कभी द्वारे से लाडली के ना हटू
मेरे शीश कमल पग धर दो स्वामिनी श्री राधे
इक कोर कृपा की...

मेरी आस ना टूटने पाए कभी
इस तन से प्राण जाए तभी
जब मुझे निज दर्शन का वर दो  स्वामिनी श्री राधे
इक कोर कृपा की..

मुझे प्रीती की रीति सिखा दीजिये
(हे श्यामाजू, प्रेम पंथ को पैन्ड़ो ही न्यारो,
कै जाने ब्रशभान  दुलारी, कै जाने यह कांवर कारो )
निज नाम का मंत्र बता दीजिये
मेरे मन की व्यथा सब हर दो, स्वामिनी श्री राधे

श्री राधाजू मोरी स्वामिनी, मैं राधाजू को दास
जनम जनम मोहे दीजियो श्री वृन्दावन वास

कहू के बल भजन है, कहू के आचार
व्यास बहरोसे कुंवारी के, सोवत पाऊँ पसार
सोवत पाँव पसर भरोसे श्री कुंवारी के
तारे अनेकन दीन असवन कृपा तुम्हरी के
नहीं ब्रह्म का ज्ञान, भक्ति नहीं भजन बिनाहू मोरी श्यामा...
कुंवारी हमरे प्राण, भले कोई सुमरे काहू

जप ताप संयम नेम नहीं इनमें कछु होई
बिन मुरली कहू नाद वाद नहीं जाने  कोई
त्रिपुटी प्राणायाम नागिनी कौन जगावे
भैय्या कुंवारी हमरे प्राण भले  कोई सुमरे काहू
मैं पापी जग में बडौ आयो तेरे द्वार
अहो भानु की लाडली निक मेरी ओर निहार
हे भानु की लाडली .... निक मेरी ओर निहार

मेरी ओर निहार कृपा कर मैं शरण तिहारी
पञ्च विषय प्रवीण संभारो श्यामा प्यारो
मैं अधमन सिरताज ना सिमरन कियो कदापि
तुम करूणा की खान श्यामा मैं अजगर पापी

इक कोर कृपा की कर दो स्वामिनी श्री राधे
दासी की झोली भर दो लाडली श्री राधे

Thursday, November 18, 2010

Bindu Goswami in his unique style

Binduji has this unique way of writing in a conversational style with Shri Krishna. One such dialogue, also sung by Shri Vinodji.
कन्हैय्या को एक रोज रो कर पुकारा,
कहा उनसे जैसा हूँ अब हूँ तुम्हारा

वोह बोले की किया क्या दुनिए में आकर
मैं बोला की अब भेजना मत दोबारा

वोह बोले की साधन किये तुने क्या क्या
मैं बोला किसे तुमने साधन से तारा

वो बोले परेशान हूँ तेरी बहस से
मैं बोला की कह दो तू जीता मैं हारा

वोह बोले जरिया तेरा क्या है मुझ तक
मैं बोला की दृग बिंदु का है सहारा...
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some dohas

That I remember from Ram Charit मानस. अगर कुछ गलती हो, मुझे बताये और मैं ठीक कर दूंगा.

हरि अनंत हरि कथा अनंता, कहत सुनत बहु बिधि सब संता

जा की रही भावना जैसे, प्रभु मूरत तिन देखि तैसी

जेहि के जेहि सत्य सनेहू, हरि मिलिहे ना कुछ संदेहू

मंगल भवन अमंगल हारी, द्रबहु सुदसरथ अजर बिहारी

सीता राम चरित अति पावन, सरस मधुर अरु अति मन भावन

Monday, October 18, 2010

Soi rasna jo by Surdas

This bhajan was written by Surdas. It explains the purpose of the various parts of the body. I shall attempt to put some explanations...

सोई रसना जो हरी गुण गावे
(रसना = जीभ - जीभ का काम है हरी गुण गाना...)
नैनं की छवि यही चतुरता जो मुकुंद मकरंद ही ध्यावे
(नैनो का काम है की वोह हर समय हरि की छवि को देखती रहे)

निर्मल चित्त तो सोई साँचो, कृष्ण बिना जिहिं और ना भावें
स्रवनन  की जू यह अधिकाई सुनी हरि कथा सुधा रस पावे
सोई रसना जो...
(निर्मल चित्त वही है जिसको कृष्ण ही अच्छे लगे, और कान कृष्ण नाम कर अमृत (सुधा) प्राप्त करते रहे)

कर ते ईसे स्याम ही सेवे, चरनन नि चरी वृन्दावन जावे
सूरदास जे बलि बंकि जो हरि जू सो प्रीती बढ़ावे
सोई रसना जो...
(कर मतलब हाथ, का काम है की वोह श्याम की सेवा में रत रहे, और चरणों का काम की वह हमेशा वृन्दावन की ओर चलते रहे)

Saturday, September 25, 2010

More by Bindu Goswami Ji | Sung by Vinod Agrawalji

Found in an album from Vinodji called Shri Dham Vrindavan:

पद आप की पाद की पालक हैं
तो झुका इनमें यह माथ रहे

यदि पंकज की उपमान में है
तो विमिश्रित पंक का पाथ रहे
(अगर आपके चरणों को पंकज या कमल की उपमा दी जाती है, तो कमल तो कीचड़ में उगता है. मेरे पापों की कीचड़ से अच्छी जगह कहा मिलेगी आपके पद-कमलो को प्रकट होने के लिए )

है गुलाब प्रसून की जो उपमा
अभी कंटक का कुछ हाथ रहे
(आपके चरणों को गुलाब की भी उपमा दी जाती है. गुलाब के नीचे कांटे होते है. हम उन कंटक जैसे है, 'कविता सविता नहीं आती, मन में जो आया बका करते है' ...)

नख मंडल है शशि मंडल सा
तो कलंक का 'बिंदु' भी साथ रहे
(आपके नाखूनों को चन्द्रमा की उपमा दे जाती है. चन्द्रमा में भी दाग है. हम वोह कलंक के दाग है... हमारा काम भी बन जाएगा और उपमा भी सार्थक हो जाएगी. इसी लाइन से पता चलता है की यह बिंदु गोस्वामी की रचना है )

मेरे बाँके बिहारी मो पे कृपा करो...

Tuesday, September 7, 2010

Mridul Krishna Shastriji | Rasik Vani

I was listening to swagatam Krishna sung by Mridul Krishna Shastriji and thought to share these with every one:
स्वागतम कृष्ण, शरणागतम कृष्ण

अभी आता ही होगा सलोना मेरा
हम राह उसी की तका करते हैं
कविता सविता नहीं जानते है
मन में जो आया सो बका करते हैं

पड़ते उनके पद पंकज में
चलते चलते जो थका करते हैं
उनका रस रूप पिया करते हैं
उनकी छवि छाप छका करते हैं

अपने प्रभु को हम ढूँढ लियो
जैसे लाल अमोलक लाखन में
प्रभु के अंग में जितनी नरमी
उतनी नरमी नहीं माखन में

स्वागतम कृष्ण, शरणागतम कृष्ण